Saturday, March 7, 2026
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चुनाव का लोकतंत्रीकरण चाहिये, मशीनीकरण नहीं

चुनाव दर चुनाव जहाँ एक पक्ष अपनी जीत का जश्न मनाता है वहीँ इस बेहद अहम लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विपक्ष और आम लोगों द्वारा कई संदेह खड़े किये जाते हैं। इस मुद्दे पर होने वाली मीडिया की चर्चाओं में अक्सर बहस ईवीएम में छेड़छाड़ या बैलेट पेपर से चुनाव कराने पर केंद्रित हो जाती है। नतीज़ा ये होता है कि कभी ईवीएम का विरोध करने वाले अचानक इसके पक्ष में छाती ठोक कर खड़े हो जाते हैं और विरोधियों पर अपने संदेह को साबित करने की ज़िम्मेदारी थोप कर पतली गली से निकल जाते हैं। यानि चोरी की रिपोर्ट लिखाने वाले से कहा जाता है कि पहले वो ये साबित करे कि चोरी हुई है या ये उसका वहम है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते हम पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को इस तरह संदेह के घेरे में आते कैसे देख सकते हैं?

भारत के प्रबुद्ध लोग और विपक्षी दल ये समझ नहीं पा रहे कि बात केवल ईवीएम हैकिंग की नहीं है बल्कि ये सबसे बड़े लोकतंत्र की पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल है। उस सरकार के चुने जाने पर सवाल है जो नागरिकों का भविष्य तय करती है। कुछ विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि एक चुनाव ईवीएम के बिना करा लिया जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा। अगर आप कल को किसी एक चुनाव को बैलेट पेपर से करते हैं तो क्या गारंटी है कि सत्ता पक्ष उस ख़ास चुनाव में प्रक्रियागत लाभ लेने की कोशिश करेगा ही? क्या वो एक चुनाव हार कर ईवीएम को शुद्ध देशी घी साबित करने की कोशिश नहीं करेगा? इसलिये मेरा मानना है कि मौजूदा चुनाव प्रक्रिया और मशीन में ही जो लूप होल्स नज़र आते हैं उनके स्पष्ट ज़वाब तलाशने की माँग होनी चाहिये। तब तक चुनाव प्रक्रिया और चुनी गयी सरकार पर देश के नागरिकों का विश्वास बनाये रखने के लिये स्वयं चुनाव आयोग को आगे आकर वीवीपैट की पूरी गिनती करानी चाहिये।

इसके साथ ही चुनाव और उसकी प्रक्रिया को लेकर एक जागरूक और पढ़े लिखे नागरिक के तौर पर मेरे सवाल कई हैं जिन पर स्पष्टता के साथ ही जवाबदेही भी तय होनी चाहिये-

1. मतदान के बाद कुल पड़े वोटों को दर्ज कर फॉर्म 17 सी कब और कितने अधिकृत पोलिंग एजेंट्स को दिया जाता है और उसे चुनाव आयोग की साइट में अनिवार्य रूप से क्यों नहीं तय समय सीमा के भीतर डाला जाता? पार्टियों से ज़्यादा ये एक संवैधानिक संस्था की संवैधानिक ज़िम्मेदारी क्यों नहीं है?

2. डिजिटल युग में कुल डाले गये वोटों की संख्या और प्रतिशत बताने में चुनाव आयोग को कितना वक़्त लगना चाहिये? कुल वोट और पड़े मतों की संख्या भी साइट पर समयसीमा के भीतर बता दे तो लोग प्रतिशत ख़ुद निकाल लेंगे।

3. मतदान का निर्धारित समय समाप्त होने के बाद कितने वक़्त मतदान चला और इस दौरान किस बूथ पर कितने वोट बढ़े उसका आँकड़ा क्यों नहीं दिया जाना चाहिये?

4. ईवीएम की चार्जिंग को लेकर उठ रहे सवालों और बाक़ी मुद्दों को शेरो शायरी के बिना सार्वजनिक मंच पर स्पष्ट क्यों नहीं किया जाता?

5. कुल डाले गये वोटों से कम या ज़्यादा गिने जाने का क्या स्पष्टीकरण है?

6. मॉक पोल के वोटों को बिना हटाये गिने जाने का मामला क्या अनंत काल तक चलता रहेगा? इसे रोकने के लिये आयोग ने अब तक आधिकारिक रूप से क्या क़दम उठाये हैं?

7. ईवीएम की सुरक्षा में सेंध यानि जगह-जगह उनका बरामद होना, चोरी हुई ईवीएम का मामला जो लोगों में बहुत चर्चित है, उसका स्पष्टीकरण अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं है?

8. कई लोगों के नाम मतदाता सूची से काटना और पुलिस प्रशासन का अवैध रूप से मतदाताओं को वोट डालने से रोकना या उनकी वोटर आईडी देखना किस चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा है? सुरक्षा का मामला बताकर इस रुकावट को कतई नज़रंदाज नहीं किया जाना चाहिये।

9. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावज़ूद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का पलड़ा मौजूदा सरकार ने अपनी ओर झुका कर क्या पूरे चुनाव आयोग को संदेह के घेरे में नहीं ला दिया है? परिस्थिति जन्य सबूत क्या ये नहीं बताते कि देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं की साख को ख़त्म करने की कोशिश एक ख़तरनाक वैचारिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है?

10. जनतंत्र में तंत्र जनता के लिये है और जनभावनाओं की उपेक्षा कर कभी भी उसके महापर्व चुनाव में जनभागीदारी को उत्प्रेरित नहीं किया जा सकता। क्या लोगों की आशंकाओं को दूर करना या उसकी माँग करना असंवैधानिक है?

उपरोक्त में मेरे वो सवाल शामिल नहीं हैं जिनमें चुनाव प्रचार के दौरान समुदायों में आपसी घृणा फ़ैलाने, वोट ख़रीदने और प्रशासन का दुरुपयोग करने पर रोक के अलावा ख़र्च की तय सीमा को कड़ाई से लागू करने, राजनीति के अपराधीकरण को रोकने और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता का सर्वोच्च रूप पेश करने जैसे स्वाभाविक और पूर्ववर्ती आयुक्तों द्वारा उनके पालन में स्थापित किये जा चुके मानदंडों पर चुनाव आयोग का खरा उतरना प्रमुख हैं।

याद रहे एक लोकतांत्रिक देश में चुनाव संपन्न कराने वाली संवैधानिक संस्था की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी चुनावी प्रक्रियाओं का निष्पक्ष और पारदर्शी रूप से पालन करते हुए मताधिकार का बृहद लोकतंत्रीकरण करना है, मशीनीकरण नहीं।

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