Saturday, March 7, 2026
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जय भीम, जय संविधान

बाबा साहब अम्बेडकर उसी तरह किसी एक के नहीं हैं जिस तरह महात्मा गाँधी, पंडित नेहरू और सरदार पटेल भी उन्हीं हर एक के हैं जो देश के निर्माण और विकास में संवैधानिक मूल्यों के अनुपालन के लिए प्रतिबद्ध हैं।

आज के माहौल में धर्म को धुरी बना कर मनुवादी मानसिकता के प्रति कुछ दलितों के अगाध समर्पण को बानगी बनाऊँ तो मैं ये कहता हूँ आज खुलकर कि काश मैं दलित होता।

मैं उतना अपमान और तिरस्कार तो सवर्ण हो कर भी झेल ही रहा हूँ लोकतांत्रिक होने के नाते लेकिन सदियों के उस अत्याचार का मुक़ाबला तो मैं अपने उन दलित साथियों के साथ कभी नहीं कर सकता जो वो मेरे ही अनचाहे भाइयों के कारण आज भी झेल रहे हैं।

लेकिन मेरा ख़ुद के लिए ये सोचना कि काश मैं दलित होता मेरी उन संवेदनाओं पर आधारित है जो मेरे परिवार, परिवेश, व्यक्तिगत अनुभव, वैज्ञानिक सोच और पढ़ाई के ज़रिये मुझे मिली हैं।

आज एक दलित मायावी शक्ति को आगे करके संविधान को उन्हीं के हाथों नेस्तनाबूद कर दलितों को अस्थायी हिन्दू बनाने की जो सियासत हो रही है वो इस समाज को देर-सवेर भारी पड़ना ही है। संविधान विरोधी लोगों के साथ केवल मज़हब के आधार पर मिल कर न तो वो इधर के रहेंगे और न उधर के।

संविधान विरोधी लोगों का धर्म के नशे में साथ दे रहे पिछड़े वर्ग के कुछ लोगों को ये सब समझाने की ज़रूरत नहीं है। बारी तो सबकी आएगी। धर्म के नाम पर सरकारी गर्व चाटने वालों की भी आएगी क्योंकि जो बीज़ इस देश में अंग्रेजों के मुखबिर और फासिस्ट ताकतों के पैरोकारों की ओर से बोया जा रहा है वो हम सबको एक दिन एक दूसरे के सामने खड़ा कर देगा। निहत्था लेकिन जॉम्बी बना के।

तलवार, भाले, छुरी, त्रिशूल और नफ़रत सब खुलेआम बाँटे जा चुके हैं। क्योंकि देश में इस समय न तो संविधान चल रहा है और न मनुस्मृति। इस समय तात्कालिक आधार पर संघ संहिता चल रही है जिसमें चौथे वर्ण के नीचे अस्थायी तौर पर अल्पसंख्यक को पांचवा वर्ण स्थापित किया गया है। इस वर्ण में उनके साथ वो सभी लोग शामिल हैं जो नागरिक बोध से पीड़ित हैं, चाहे वो किसी भी वर्ण के क्यों न हों। जो देश में हर नागरिक को समान अधिकार, लोकतंत्र, संविधान, धर्म निरपेक्षता, पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय पूर्ण व्यवस्था स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं वो संघ वादियों को सबसे ज़्यादा खटकते हैं।

मनुवादी वर्ण व्यवस्था में इस क्रांतिकारी बदलाव से अस्थाई हिन्दू एकता की उम्मीद सत्ता लोलुप सवर्णों को दिखाई दे रही है। दलित वंचित समाज को ये बता कर बहलाया जा रहा है कि वर्णक्रम में सबसे नीचे पाँचवा पायदान लगने से अब वो अंतिम छोर पर नहीं रहे। उनका प्रमोशन हो गया है।


(Jay Bheem Jay Samvidhan)

इससे होगा क्या? पहले चार, पाँचवे के ख़िलाफ़ एकजुट होंगे और फ़िर तीन, चौथे के ख़िलाफ़। बहुत जल्द पुनर्मूषको भवः की स्थिति आ जाएगी। लेकिन अब ये जातीय वर्चस्व की तकरार ख़ुद सवर्णों के बीच भी नहीं रुकेगी। वो तो अभी भी चल रही है।

तो क्या कहना है आपका दलित, पिछड़ो, आदिवासियो, वंचित, शोषितो? आप ख़ुद समझोगे या मुझे ही अपनी संवेदनाओं के सभी छिद्र बंद करने को कहोगे जो बीते सालों में मैंने अपने अनुभवों से खोले हैं।

इसीलिए आज मेरी और आपकी सोच में कोई अन्तर नहीं। एक दूसरे को बचाने के लिए संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक सद्भावना की रक्षा हमारा एकमात्र लक्ष्य है और होना चाहिए।

केवल अम्बेडकर जी की जय बोलने से काम नहीं चलेगा। उनके विचारों को भी अमल में लाना होगा। व्यक्ति नश्वर है जबकि सत्य, न्याय और करुणा पर आधारित सर्व समावेशी नेक विचार ही बुद्ध है।

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