नये भारत में वैसे तो बाहर और भीतर बहुत कुछ मार दिया गया है, लेकिन हमारी पीढ़ी में अभी भी लिहाज बाक़ी है। वर्ना उन पढ़े लिखे मूर्खों के बारे में बहुत कुछ कहा और किया जा सकता है, जिनकी वज़ह से देश आज गर्व खा खाकर इस गर्त तक पहुँच गया है। कहने का मतलब ये है कि आज़ादी हासिल करने के बाद कुछ दशकों तक भारत के लोग आज़ादी में अपने पुरखों के योगदान पर अभिभूत रहे लेकिन धीरे-धीरे उनकी कुर्बानियाँ हमारी सुविधाओं और दुविधाओं की भेंट चढ़ गयीं।
हम ये भूल गये कि आज़ादी केवल हासिल नहीं करनी होती बल्कि उसे पाल पोस कर परवान भी चढ़ाना होता है। आज़ादी के निर्धारित लक्ष्यों को पाने के लिये ऐसा तंत्र विकसित करना होता है जो फ़िर किसी गद्दार या मुखबिर को सर उठाने का मौक़ा न दे। हम भूल गए कि आज़ादी को बरकरार रखना एक सतत प्रक्रिया है जिसमें हर पल व्यवस्था के उन नकारात्मक पहलुओं को पहचान कर उन्हें ख़त्म किया जाना चाहिए जो फ़िर से लोगों को गुलामी की मानसिकता में धकेल सकते हैं। लेकिन अफ़सोस कि ये हो नहीं पाया।

आज़ाद भारत ने संविधान के जरिये ख़ुद को समाजवादी, लोकतांत्रिक, पंथनिरपेक्ष देश की संकल्पना के साथ जोड़ा और नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के ज़रिये विकास की प्रक्रिया को अंतिम पायदान पर खड़ी जनता तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। देश में साम्प्रदायिक सौहार्द्र और सद्भावना का वातावरण बनाने के लिये उचित क़ानून भी बनाये गये। लेकिन देश के शुरुआती चार दशकों में सत्ता पर रही कांग्रेस ने आज़ादी के आंदोलन की कोख से निकली राजनीतिक चेतना पर अधिक भरोसा किया। वो ये भूल गई कि राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जो साम्प्रदायिक ताकतें देश को बाँटकर ब्रिटिश हुकूमत से वैधानिकता हासिल कर चुकी हैं वो आज़ादी के बाद भी अपना ख़ूनी खेल जारी रखेंगी। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद भी कांग्रेस की ये वैचारिक सदाशयता अंततः देश को उस मुक़ाम पर ले आयी जहाँ नफ़रत की विचारधारा न सिर्फ़ कांग्रेस के लिये बल्कि संविधान, लोकतंत्र,सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा साबित हो रही है।

कांग्रेस ने देश में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा तो दिया लेकिन संविधान और लोकतंत्र विरोधी तंत्र मंत्र षड्यंत्र को खुला छोड़ दिया। नतीज़ा ये कि पिछले सात दशकों में लाखों, करोड़ों वैज्ञानिक, इंजीनियर, बड़े बड़े नौकरशाह और कर्मचारी जिस थाली में खाकर इस लायक बने, उनमें से ज़्यादातर आज व्हट्सएप गोष्ठियों में वैचारिक तौर पर उसी थाली में छेद करते दिखते हैं। इन्हीं कुछ मूर्खों को बनाने और पालने में हमने अपनी सात दशकों की आज़ादी की सारी कमाई लुटा दी। देश के लोग भले ही अपने विकास की यात्रा में आए इस नकारात्मक बदलाव को भूल जायें लेकिन इतिहास इन सभी मूर्खों को इक्कीसवीं सदी पर लगे काले धब्बों के ज़रिये याद रखेगा।
आखिर इस सदी के आते आते ऐसा क्या हुआ कि देश में अचानक मूर्खता की बाढ़ सी आ गई और संविधान, लोकतंत्र, समाजवाद और सामाजिक न्याय जैसे शब्द सत्तारूढ़ साम्प्रदायिक ताक़तों और उनके समर्थकों के कानों में चुभने लगे? आख़िर चूक कहाँ हुई? ये समझने के लिए आपको वैश्विक स्तर पर शीतयुद्ध की समाप्ति और भारत में आर्थिक उदारीकरण के शुरुआती दौर में जाना पड़ेगा. आज़ाद भारत के अब तक के विकास क्रम को आप उदारीकरण से पहले और बाद के दो हिस्सों में बाँट सकते हैं.

जिन लोगों ने पहले दौर में साँस ली है वो पीढ़ी याद कर सकती है कि उन दिनों देश तमाम चुनौतियों से मिलकर जूझ रहा था। सरकार आलोचनाओं का सामना करती थी और आंदोलन के किसी भी रूप पर कोई पाबंदी नहीं थी। सिनेमा से लेकर नुक्कड़ नाटकों तक, लेई से दीवारों पर पोस्टर चिपकाने से लेकर अख़बारों तक सरकार की आलोचनाओं और प्रतिरोध की आवाज़ों के लिये पर्याप्त जगह थी। कांग्रेस ने तो अपने इस लोकतांत्रिक मिजाज़ का खामियाज़ा दूसरे दौर में यूपीए टू की मनमोहन सरकार के खिलाफ़ अन्ना आंदोलन में भी भुगता जिसका भुगतान आज पूरा देश कर रहा है।
ख़ैर तो मैं बात कर रहा था आर्थिक उदारीकरण से पहले के दौर की जिस दौरान आतंकवाद चरम पर था, ज़्यादातर लोग धार्मिक भी थे सहिष्णु भी, शायराना भी थे और भागवत कथा के श्रोता भी, मज़हबी भी थे और इंसान भी। यही वो दौर था जिसने एक दशक के भीतर एक ही पार्टी और एक ही परिवार से देश के दो प्रधानमंत्रियों की शहादत देखी और ख़ून के आँसू रोये।
इस दौर के जाते जाते वक़्त ने वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर करवट बदली. सोवियत संघ जैसी साम्यवादी महाशक्ति आर्थिक खुलेपन को स्वीकार कर अपने संघीय ढांचे को बचा नहीं पाई और बिखर गई। दुनिया पूँजीवाद के आगे नतमस्तक हो कर अपने बाज़ारों को प्रतिस्पर्धा के नाम पर खोलने को बेचैन नज़र आने लगी थीं. लेकिन भारत में वो दौर परिवर्तन के एक अलग ही संक्रमण काल से गुज़र रहा था. बोफोर्स के भ्रष्टाचार और मंदिर मस्जिद के मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल का लाभ अन्ना आंदोलन की तरह ही इस पहले दौर में भी साम्प्रदायिक शक्तियों ने लेने की कोशिश की थी लेकिन जबाव देने के लिये उस वक़्त सामाजिक न्याय की शक्तियाँ उसके सामने थीं।
कांग्रेस की सदाशयता ने एक बार फ़िर इन फासीवादी ताक़तों को समाज के एक तबके का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करके सिर उठाने और पाँव जमाने का मौका दे दिया। यही वो दौर था जब भारत ने भी अर्थिक उदारीकरण को अपना कर बाज़ार खोल दिये और साम्प्रदायिक शक्तियों ने स्वदेशी के नाम पर समाजवादी और वामपंथी विरोध के सुर में सुर मिला दिया।
ये नया दौर अपने साथ सूचना और संचार क्रांति तो लाया ही नागरिक सुविधाओं में निजीकरण की हिस्सेदारी भी बढ़ने लगी। इसके साथ ही बढ़ने लगी अमीर और ग़रीब के बीच की खाई। दिलचस्प बात ये रही कि स्वदेशी के घोड़े पर सवार बीजेपी भी सरकार बनाते ही उदारीकरण के हाईवे पर सरपट दौड़ने लगी। परमाणु परीक्षण से लेकर विदेश नीति तक में सफलताओं के बावज़ूद आर्थिक असमानता के यथार्थ ने वाजपेयी सरकार के शाइनिंग इंडिया के गुब्बारे की हवा निकाल दी।
संयोग से ऐसे वक़्त में यूपीए की सरकार का नेतृत्व उन्हीं डॉक्टर मनमोहन सिंह को सौंपा गया जिन्होंने बतौर वित्त मंत्री नरसिम्हा राव की सरकार में उदारीकरण की शुरुआत की थी। यूपीए सरकार ने समस्या को भाँप कर उदारीकरण की नीतियों को मानवीय चेहरा देने की कोशिश की। कई ऐसी योजनाएँ शुरू की गईं जो निजीकरण का लाभ निचले और मध्यम वर्ग तक पहुँचाने में मददगार साबित हुईं। छठे वेतन आयोग ने नौकरीपेशा और पेंशनधारकों के खाते में भरपूर पैसे पहुँचाए जिससे देश को वैश्विक मंदी में भी आर्थिक मोर्चे पर ख़ुद को मज़बूत रखने में मदद मिली।
देश की जनता का पैसा देश की जनता के पास लौटता देख कोर्पोरेट ताकतें यूपीए टू की सरकार के विरोध में राजनीतिक माहौल को हवा देने लगीं। सरकार के भीतर कोर्पोरेट के नुमाइंदे उनके इशारे पर काम करने लगे। भ्रष्टाचार, क़ानून व्यवस्था और तमाम मुद्दों के ज़रिये विपक्ष को मज़बूत करने की रणनीति बनाई गई। ये वही वक़्त था जब शायद उदारीकरण के पैरोकार ख़ुद अपनी नीतियों के विद्रूप चेहरे को पहचान कर उन्हें अधिक जनोन्मुखी बनाने की दिशा में बढ़ जाते। लेकिन कोर्पोरेट को ये बात कैसे रास आती? उसे तो एक बार फ़िर सरपट दौड़ने वाले घोड़े पर दाँव लगाना था और वही उसने किया भी।
दिल्ली के रामलीला मैदान में एक लोकपाल नाम की चिंगारी को हवा दी गयी जिसने कोर्पोरेट मीडिया, सोशल मीडिया, पंजीकृत या अपंजीकृत स्वयंसेवी संस्थाओं और तमाम झूठे सच्चे चेहरों के दम पर सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाया। इस भीड़ में वो लोग भी शामिल थे जिनके वेतन और पेंशन में मनमोहन सरकार में जमकर इजाफ़ा हुआ था। भरे पेट वालों को अब धर्म की बूटी की दरकार थी। राजनीतिक भ्रम के इसी कुहासे के बीच कोर्पोरेट ने अपने घोड़े को दिव्यता के एहसास के साथ राजपथ पर छोड़ दिया। पिछले दस सालों में नोट बंदी, जीएसटी जैसे फ़ैसलों के बाद देश की अर्थव्यवस्था की जो हालत आपके सामने है वो घोड़ों की नस्ल को लेकर आपके सामान्य ज्ञान को परिष्कृत करने के लिए काफ़ी है।

उदारीकरण के बाद के इस दौर में देश ने जहाँ सूचना और संचार तकनीक में क्रांतिकारी बदलाव की ओर छलाँग लगाई वहीं पिछले एक दशक में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और नागरिक चेतना के स्तर पर उसे कई साल पीछे धकेल दिया गया। प्रतिरोध की आवाज़ों को दबा कर विपक्ष की रही-सही ताक़त भी छीन ली गई। मीडिया समेत देश के तमाम संसाधनों पर कोर्पोरेट का और संवैधानिक संस्थाओं पर साम्प्रदायिक ताकतों का कब्ज़ा हो गया। नागरिक चेतना को अल्पसंख्यक विरोध, जातीय संघर्ष, त्वरित न्याय और धर्म कर्म के आयोजनों तक सीमित कर दिया गया। हाल ये है कि जो देश एक वक़्त विकास की राह पर कुलांचे मारने को आतुर था अब ख़ुद को किसी तरह खड़ा रखने की जद्दोजहद कर रहा है। यहाँ तक कि कई लोग मौजूदा दौर को देश की आज़ादी, संविधान, लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर सबसे बड़े ख़तरे के रूप में देख रहे हैं।
दरअसल हमारा देश ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी के बाद राजतंत्र की पैरोकार रियासतों का एकीकरण करके संघीय लोकतंत्र के तौर पर स्थापित हुआ। इस परिघटना को हुए अभी इतिहास के कालखंड का बहुत ही छोटा हिस्सा बीता है। ज़ाहिर है अभी भी कुछ सियासी जमींदार लोगों को जाति, धर्म, क्षेत्र और बोली पर बाँट कर अपनी सत्ता के लिए लड़ रहे हैं। इस लिहाज़ से देखा जाए तो मौजूदा हालात आज़ादी की लड़ाई का ही अगला संस्करण लगते हैं। हर राज्य के अपने अपने महाराज यानी क्षत्रप हैं जिनमें से ज़्यादातर के पास कोई राष्ट्रीय सोच नहीं। ये बात उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जबकि नफ़रत की विचारधारा के पुरोधा सत्तारुढ़ काले अंग्रेज ख़ुद ही राष्ट्रवाद का झंडा उठा कर बापू के अहिंसक डंडे को गरियाने निकले हों।
संवैधानिक संस्थाओं की गिरावट हो, सरकारी एजेंसियों का दमनकारी रुख़ हो, बेगुनाहों को काल कोठरी में धकेलना हो, सूचनाओं पर नियंत्रण हो या फ़िर बहुसंख्यक जनता को नागरिकता बोध से वंचित कर देना हो, क्या आपको ये दौर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से कुछ मिलता-जुलता नहीं लगता? क्या मौजूदा सत्ता का चुनिंदा कोर्पोरेट को देश के सारे संसाधन सौंप देना ईस्ट इंडिया कंपनी की याद नहीं दिलाता? क्या किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं, दलितों, वंचितों और प्रतिरोध की सभी आवाज़ों को सख़्ती से कुचलने या उसे नज़रअंदाज करने की मौजूदा सरकार की हनक लोकतांत्रिक कही जा सकती है? क्या देश की आज़ादी पर बार बार अधकचरे सवाल खड़े करना उसके लिये कुर्बानी देने वाले लाखों करोड़ों देशभक्तों का अपमान नहीं है? क्या फासीवाद की ख़ूनी कलम से देश के इतिहास का पुनर्लेखन संविधान की आत्मा पर हमला नहीं है?

ये संयोग है कि नियति का कोई प्रयोग कि मुखबिरी की विरासत लिए काले अंग्रेजों के इन ऐतिहासिक षडयंत्रों के विरुद्ध इस बार भी एक गाँधी खड़ा है ताल ठोक कर। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि बापू की दिखाई दिशा और नेहरू की दूरदर्शी सोच को ज़मीन पर उतारने की जिजीविषा हमारे देश में अभी भी क़ायम है। तलाश है तो बस लोकतंत्र, संविधान और आज़ादी को बचाने के एजेंडे पर फ़िर से देश की प्रगतिशील ताक़तों को एकजुट करने, संविधान की सत्ता को पुनर्स्थापित करने और गोदी पूंजीवाद का रुख फ़िर सामाजिक आर्थिक न्याय की ओर मोड़ने वाले इक्कीसवीं सदी के पटेल, अम्बेडकर, इन्दिरा और शास्त्री जैसे नायकों की। क्या आप के भीतर इनमें से कोई है?