Thursday, September 24, 2026
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चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम बंदी

15 फरवरी। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिये बीजेपी सरकार की ओर से लायी गयी चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की संविधान पीठ ने आज ये ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया अदालत ने सर्वसम्मति से अपने फ़ैसले में चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक क़रार दिया और इसकी गोपनीयता पर सवाल उठाते हुए उसे नागरिकों के सूचना के मौलिक अधिकार का हनन बताया। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र की मोदी सरकार के लिये बड़ा झटका माना जा रहा है।

क्या हैं चुनावी बॉन्ड?

चुनावी बॉण्ड प्रणाली को वर्ष 2017 में केंद्र की बीजेपी सरकार ने एक वित्त विधेयक के माध्यम से लोकसभा में पेश किया था। इसे वर्ष 2018 में लागू किया गया। इसके तहत चुनावी चंदा देने वाले की गोपनीयता बनाए रखते हुए पंजीकृत राजनीतिक दलों को दान देने के लिये व्यक्तियों और संस्थाओं हेतु एक कथित पारदर्शी व्यवस्था बनायी गयी। केवल वे राजनीतिक दल जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29 ए के तहत पंजीकृत हैं और जिन्होंने पिछले आम चुनाव में लोकसभा या विधानसभा के लिये डाले गए वोटों में से कम-से-कम 1% वोट हासिल किये हों, वे ही चुनावी बांड हासिल करने के पात्र बनाये गये।

क्या था मामला?

सरकार की ओर से आरबीआई ये बांड्स जारी करता है। चंदा देने वाला भारतीय स्टेट बैंक से बांड खरीदकर किसी भी पार्टी को दे सकता है। फिर राजनीतिक पार्टी अपने खाते में बॉन्ड भुना सकेगी। बॉन्ड से पता नहीं चलेगा कि चंदा किसने दिया। ये बांड जब बैंक जारी करता है तो इसको लेने की अवधि 15 दिनों की होती है।

चुनावी बॉन्ड को सरकार ने आरटीआई के दायरे से बाहर रखा है। यानी आम जनता आरटीआई के तहत चुनावी बॉन्ड से संबंधित जानकारी नहीं मांग सकती है। जबकि कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ये वोटर्स का मौलिक अधिकार है कि वो पार्टियों के फंड के बारे में जानकारी रखें। बैंक से छह मार्च तक चुनाव आयोग को चुनावी बॉन्ड से संबंधित सारी जानकारी देने को कहा गया है। आयोग तेरह मार्च तक सारी जानकारी बेवसाइट पर प्रकाशित करेगा।

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