गाँधी जी से लेकर भगत सिंह, नेहरू-पटेल से लेकर बोस-आज़ाद तक हमारे देश पर कुर्बान होने वालों की एक बेहद लंबी फ़ेहरिस्त है। आज़ादी की उस लड़ाई में अपने अपने तरीकों से हर मज़हब के सभी सेनानियों ने अमिट योगदान दिया। ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध किसी ने खुला सीना तान कर लोगों की अगुआई की तो किसी ने नेपथ्य में हाथ से हाथ जोड़ कर कर आम लोगों को एकजुट किया। कई गुमनाम बाँकुरे उसी नींव में दफ़्न हो गये जिस पर आज़ाद लोकतांत्रिक भारत की ये ख़ूबसूरत इमारत खड़ी हुई। मक़सद इन सबका एक ही था देश को अंग्रेजों की ग़ुलामी से मुक्त करा कर अपने नागरिकों को वो सारे अधिकार दिलाना जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित समाज का निर्माण करने के लिये होने चाहिए। क्या लीडर क्या वकील, छात्र, कवि, लेखक, पत्रकार, शिक्षक, किसान, मजदूर, फ़ौजी, क्लर्क, गीतकार, संगीतकार, कलाकार, दुकानदार, चौकीदार, महिलाओं, बच्चों सबने अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से इस संघर्ष में भागीदारी की।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उस वक़्त पूरा देश ही इस आंदोलन में कूद पड़ा था। तब भी कई नौकरीपेशा लोग थे जिन्होंने इस आंदोलन को लेकर उदासीनता बनाये रखी। कई ऐसे तबके थे जो ब्रिटिश सत्ता के क़रीब दिखने में अपनी शान समझते थे। कुछ लोग हुकूमत से ईनाम इक़राम, रियासत, उपाधियाँ और विशेषाधिकार के लालच में रेंगने लगते थे। इस लिहाज़ से भारतीय समाज की मानसिकता में आज भी बहुत बदलाव नहीं आया है। फूट डालो राज करो की नीति आज भी उतनी ही कारगर दिखती है। संसाधनों पर कब्ज़ा कर सत्ता बनाये रखने की रणनीति ने देश में शासक और शासित के बीच बँटवारे की बड़ी लकीर खींच दी है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता है जैसे हम अपने इर्द गिर्द इक्कीसवीं सदी के पहले चौथाई में उन्नीसवीं सदी की फ़िल्म देख रहे हैं? वही खीसे निपोरते सत्ता के मुख़बिर, वही सिर ताने सत्याग्रही, वही हालात से उदासीन क़िस्मत के मारे हुकूमत के ख़िदमतगार, वही मज़हबी उन्माद में डूबे लोग, वही सत्ता का क़ानून, वही अदालतें, वही जेल। क्या जाने हम किस रामराज्य की ओर बढ़ रहे हैं?
सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पतन के बावज़ूद सूचना क्रांति इस दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि है। ये एक ऐसी दोधारी तलवार है जिसका लाभ स्वाभाविक तौर पर सत्ता को मिलता रहा है लेकिन इससे उसकी खामियाँ भी उजागर होती रहती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में ये माध्यम लोगों को उनके अधिकारों, कर्त्तव्यों और ख़तरों के प्रति जागरूक करता है जबकि निरंकुश सत्ता इसे संपर्क तक सीमित कर देती है। मीडिया पर सत्ता का चाहे अनचाहे नियंत्रण तो हर दौर में रहा है। आज़ादी के आंदोलन में भी कई स्थानीय पत्र पत्रिकाएँ, पैम्फलेट, पोस्टर, नुक्कड़ नाटक और दीवारों पर लिखाई जैसी गतिविधियाँ आज के दौर की सोशल मीडिया वॉल, ब्लॉग और वीडियो चैनल के ही पुरातन रूप थे। उस दौर में भी ब्रिटिश हुकूमत ने कई लोगों को आज़ादी से जुड़े प्रतिबंधित साहित्य रखने के ज़ुर्म में जेलों में ठूँसा था। आज की तरह कई लोग तब भी नहीं झुके थे।
बहरहाल उस दौर में पाश्चात्य से आ रही स्वतन्त्रता और नागरिक अधिकारों की खुशबू ने हम भारतीयों को भी ग़ुलामी के विरुद्ध एक लंबी लड़ाई लड़ने के लिये प्रेरित किया। इस लड़ाई में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक हर पहलू का समावेश था। अंग्रेजों और उनके पिट्ठुओं के अत्याचारों से आजिज़ आ चुके इस विशाल भूभाग के लोगों के पास हौसला तो था लेकिन साधन नहीं थे जिनके दम पर ब्रिटिश हुकूमत को सीधे चुनौती दी जा सकती। लोग विचार से लेकर व्यवहार तक हर क्षेत्र में बँटे हुए थे। जो लोग सशस्त्र विरोध के पक्षधर थे वो तमाम दबावों के बीच अपने तरीके से जुटे रहे और देश के लिए बलिदान तक दे गये। लेकिन एक विशाल आबादी वैचारिक और शारीरिक तौर पर उनसे नहीं जुड़ पायी। निराशा के ऐसे दौर में अहिंसा और सत्याग्रह की रोशनी लेकर गाँधी जी ने लोगों को एकजुट किया और आंदोलन में एक नई जान फूँक दी। डूबते को बस तिनके का सहारा चाहिये था लेकिन मिल गई लाठी। वो भी ऐसी जो किसी पर उठानी नहीं थी, बल्कि उसके सहारे तो पूरे देश को सत्य और अहिंसा का नया प्रयोग करना था।
ये महज संयोग है या नियति का कोई प्रयोग कि उस वक़्त भी एक निडर गाँधी सत्ता की आँख में आँख डाल कर उसे चुनौती दे रहा था और आज भी गाँधी का विचार ही मौजूदा सत्ता की आँख की किरकिरी बना हुआ है। क्या आज़ादी के अमृत काल में फ़िर एक बार सत्य और असत्य के बीच मंथन चल रहा है? क्या इस बार भी गाँधी के विचार मौजूदा समाज रूपी समुद्र से निकल रहे हलाहल को निष्प्रभावी कर सबको लोकतंत्र का अमृत बाँट पायेंगे? क्या काले अंग्रेजों की सरकारी हिंसा के आगे गाँधी के सिद्धांतों का जादू चल पायेगा? क्या भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, बोस, आज़ाद, अशफ़ाक जैसे क्रांतिकारियों को पूजने की औपचारिकता निभाने वाला समाज उनकी कुर्बानियों की बदौलत मिले संविधान, लोकतंत्र, आज़ादी और स्वाभिमान की रक्षा के लिये संघर्ष करने को भी तैयार है? क्या क्षेत्रीयता, धार्मिकता, भाषा जैसे अवरोधों को भेद कर जनता फिर गाँधी के पीछे लामबंद होगी? क्या तिनका तिनका जुड़ कर वो रस्सी तैयार हो पायेगी जिससे महान देश की जनता मंझधार से लोकतंत्र को सुरक्षित बाहर निकाल सके? इन सवालों के जवाब माँग रहे गाँधी तो आज भी जनता और सत्ता दोनों से कह रहे हैं, डरो मत, डराओ मत।
मित्रों, आप सभी से पूछना था कि क्या इन दिनों देशभक्ति से ओतप्रोत ऐसे कथानक पर कोई सुपरहिट फ़िल्म बन सकती है क्या?
अरे, इतना सन्नाटा क्यों है भाई!